
Ajahun Chet Ganwar
विवरण: "अजहूं चेत गंवार! नासमझ! अब भी चेत! ऐसे भी बहुत देर हो गई। जितनी न होनी थी, ऐसे भी उतनी देर हो गई। फिर भी, सुबह का भूला सांझ घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता। अजहूं चेत गंवार! अब भी जाग! अब भी होश को सम्हाल! ये प्यारे पद एक अपूर्व संत के हैं। डुबकी मारो तो बहुत हीरे तुम खोज पाओगे। पलटू दास के संबंध में बहुत ज्यादा ज्ञात नहीं है। संत तो पक्षियों जैसे होते हैं। आकाश पर उड़ते जरूर हैं, लेकिन पद-चिह्न नहीं छोड़ जाते। संतों के संबंध में बहुत कुछ ज्ञात नहीं है। संत का होना ही अज्ञात होना है—अनाम। संत का जीवन अंतर-जीवन है।" — ओशो संदर्भ: पलटू-वाणी पर प्रश्नोत्तर सहित पुणे में हुई सीरीज के अंतर्गत दी गईं इक्कीस OSHO Talks.
















